Monday, December 21, 2009

जीवन की चुनौतियां

विज्ञान चाहे जितनी भी उन्नति कर लेकिन जीवन जीना मनुष्य केलिए सदैव ही चुनौती रही है। विश्व बिरादरी में जीवन सहज नहीं रह गया है। भौतिक उन्नति के बाद भी सम्पूर्ण विश्व आज किसी न किसी विपदा का सामना कर रहा है। प्राकृतिक आपदाओं ने सदैव ही मनुष्य के सामने ऐसी चुनौती पेश किया है जिससे पूर्ण रूप से बचना उससे लिए संभव नहीं है। जीवन के अपने भी दु:ख-दर्द हैं। ऐसे में हमारा आदर्श जीवन कैसा हो, इस पर चिन्तन जरूरी हो जाता है।
विश्व के कई ऐसे कारक है जो प्रत्यक्ष- अप्रत्यक्ष रूप से हमें प्रभावित करते रहते हैं। हो सकता है कि उत्तर भारत में रहने के कारण सुनामी और समुद्री तूफान से हमारे जीवन पर कोई प्रभाव न पड़े लेकिन मूल रूप से इन घटनाओं के कारण हमारा मन उद्वेलित होता है। विश्व के विभिन्न भागों में आने वाले भूकंप तथा आतंकवादियों घटनाएं भी अप्रत्यक्ष रूप से हमारों को प्रभावित करती हैं। यह संभव नहीं है कि जीवन में सब कुछ सूक्ष्म रूप से सरल-सहज रूप से चलता रहे। जीवन में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से विपदाओं का सामना तो हर हाल में करना ही पड़ेगा। जीवन में आने वाली कठिन परिस्थितियों का सामना करने के दो तरीके हो सकते हैं। या तो उन से हम दूर भाग जाये या उस पर विजय प्राप्त करने की कोशिश करें। जीवन से डर कर भागने वाले के लिए इस सृष्टिï में कहीं भी स्थान है। अंतोगत्वा उसे कहीं न कहीं तो ठिकाना ढूंढना ही पड़ेगा। अगर हर जीवन में आने वाली परिस्थितियों का सामना करेंगे तो निश्चित रूप से सफलता की ओर पड़ते जायेंगे। यह सही है कि एक चुनौती पूरी होने पर दूसरी चुनौती का सामना करने को हमें तैयार होना पड़ेगा। हमारे जीवन की असली जीत तो यह है कि अधिक से अधिक परेशानी में भी अपने मानसिक संतुलन को हम न खोये। इसी प्रकार से खुशी या सफलता से हम इतने अधिक प्रफ्फुलित न हो जाये कि खुद को ही भूल जाये। खुशी में भावों पर नियंत्रण रखना ठीक उसी प्रकार से जरूरी हो जाता है जैसे परेशानियों में संतुलित रहते हैं।
वास्तविकता यह है कि जैसे-जैसे विकास के पथ पर विश्व आगे बढ़ रहा है, कई विनाशकारी घटनाएं भी घटित रही हैं। मेडिकल साइंस ने उन्नति की है लेकिन मनुष्य का जीवन फिर भी सुरक्षित नहीं है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि मनुष्य जीवन हमें इसीलिए मिला है कि हम उन चुनौतियां का सामना करें, न कि उनसे दूर भाग खड़े हो। हमारा जीवन समुद्र में उतरे उस जहाज की तरह है जिसे हर पल समुद्र की उग्र धाराओं, प्रतिकूल हवा तथा व्हेल-शार्क का सामना करना पड़ता है। बंदरगाह में खड़े जहाज के सामने इस प्रकार की कोई चुनौती नहीं रहती है। अगर जहाज तैयार हुआ है तो उसका धर्म है कि समुद्र में उतर कर वह चुनौतियों का सामना करें। इसी प्रकार से मनुष्य का जीवन चुनौतियों को स्वीकार करने के लिए ही बना है।
जब जीवन में बाधाएं आ खड़ी हो तब हमें आतंरिक शक्तियों को जागृत करके नयी प्रकार की ऊर्जा का अनुभव करना चाहिए। यह नहीं भूलना चाहिए कि मनुष्य का जीवन संघर्षों का सामना करने के साथ ही प्रेम और सहयोग करने के लिए बना है। जीवन का वास्तविक ध्येय खुद को उबारने के साथ ही दूसरे की मदद का भी होना चाहिए। यह नहीं भूलना चाहिए कि अकेला मनुष्य कुछ नहीं सकता है। किसी भी मनुष्य की पहचान दूसरे मनुष्य से ही है। इसका अभिप्राय यह भी नहीं है कि हम खुद दूसरों पर आश्रित हो जाये। देखा यह जाता है कि अकसर हम किस कारण से भी दु:खी रहते हैं कि दूसरों से काफी अपेक्षाएं कर लेते हैं। इन अपेक्षाओं के पूरा न होने पर हमको दु:ख का अनुभव होता है। दरअसल हमें जीवन में कृतज्ञता का भाव विकसित करना चाहिए। हमें संसार के समस्त प्राणियों के प्रति ऋणी होना चाहिए जिन्होंने किसी न किसी रूप में हमारे विकास और पोषण में अपनी भूमिका का निर्वाह किया है। यह नहीं भूलना चाहिए कि ऐसी कोई समस्या नहीं है कि जिसका समाधान न हो। हर रात के बाद सुबह होती है। इस प्रकार से दु:ख के बाद जीवन में सुख का उदय होगा। जरूरी यह है कि दिल के किसी कोने में उम्मीद की जोत जलाकर रखी जाये।
अगर अपने जीवन को प्रेममय बना लिया जाये तो संसार में सब कुछ अच्छा लगने लगेगा। सभी से प्रेम करेंगे तो नफरत करने के लिए कोई रह ही नहीं जायेगा। जब नफरत नहीं रहेगी तो मन में किसी प्रकार का कोई द्वेष नहीं होगा। मन निश्छल और स्वच्छ रहेगा। ऐसे में मन सदैव साकारात्मक विचार ही आयेंगे। इन विचारों का जीवन में विशेष रूप से महत्व है। कई लोग इसलिए दु:खी रहते हैं क्योंकि साकारात्मक के स्थान पर नाकारात्मक विचार उन पर हावी रहता है। वे सब भी सोचते हैं, उल्टा ही सोचते हैं। इन विचारों को लेकर कोई भी मनुष्य कभी भी सुखी जीवन नहीं जी सकता है। वैसे भी कहा गया है कि आने वाले कल की चिन्ता छोड़ कर आज में जीओ। कल किसने देखा है। इसका अर्थ यह नहीं निकाल लेना चाहिए कि 'प्लानिंगÓ का कोई महत्व नहीं है। आने वाले कल के लिए योजनाबद्ध रूप से नीति निर्धारण काफी जरूर है लेकिन कल की चिन्ता में आज को न जीना कहां की बुद्धिमानी है? हर पल ऐसे जीये जैसे वह आपके जीवन का अंतिम पल हो। न किसी से बैर, न किसी से शिकवा-शिकायत। जीवन योगी जैसा होना चाहिए। अपने में मस्त। कर्म को महत्व देने वाला। जीवन में कर्म और धर्म के साथ अध्यात्म का महत्व भी होना चाहिए। मनुष्य की भौतिक उन्नति के साथ ही आध्यात्मिक उन्नति भी जरूरी है। आध्यात्मिक रूप से विकसित चेतन व्यक्ति का जीवन अलग ही होता है। जीवन की साधारण घटनाओं से वह दु:खी नहीं होता है। उसे सम्पूर्ण विश्व अपना सा लगता है। उसमें रहने वाले हर एक को वह अपना मानता है। वह भूल जाता है कि वह तन्हा आया है और तन्हा ही उसे जाना है।

पाश्चात्य संस्कृति से खतरे

आधुनिक पाश्चात्य जीवन शैली ने हमें हमारी लोक संस्कृति से अलग कर दिया है। पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव में हमारी देशी संस्कृति एक कोने में खो सी गयी है। शहरी संस्कृति ने ग्रामीण जीवन की मौज-मस्ती को एक प्रकार से लील लिया है। अपनी सांस्कृतिक जड़ों से हम कटते जा रहे हैं। अगर इस स्थिति पर अंकुश नहीं लगाया गया तो वह दिन दूर नहीं जब हमारी स्वतंत्र रूप से पहचान नहीं रहेगी। दरअसल जिस संस्कृति को हम आत्मसात करना चाहते हैं, वह हमारी है ही नहीं। जिस संस्कृति के चकाचौंध में हम फंसे हुए हैं, उसमें रचना-बसना किसी भी दृष्टिï से हमारे लिए हितकारी नहीं है। भारतीय संस्कृति की सर्वोच्चता आज विश्व स्वीकार कर रहा है।
भारतीय संस्कृति की विविधता और विशालता किसी से छुपी नहीं है। उसके बाद भी उधार की संस्कृति के प्रति आकर्षण कहीं से भी सही नहीं है। सांस्कृतिक हमले के फलस्वरूप हम दूसरी संस्कृति के गुलाम होते जा रहे हैं। अपने परम्परागत लोकगीत व संगीत चाहे हमें न पता हो लेकिन विदेशी धुनें हमें सदा याद रहती हैं। देशी धुनों की मिठास के स्थान पर विदेशी धुन का तीखापन हमें रास आ रहा है। वी तथा एम टी.वी. की संस्कृति में अपनी लोकसंस्कृति को हम कहीं भूल सा गये हैं। अब हमारे अपने देशी आयोजन भी विदेशी अंदाज में होने लगे हैं। बच्चों के जन्मदिन मनाने से लेकर विवाह उत्सव तक सभी कुछ विदेशी रंग में रंग चुका है। बच्चे का अब 'जन्मदिनÓ नहीं 'बर्थ डेÓ होता है। बर्थडे पर केक काटने की परम्परा देशी कहीं से नहीं कहीं जा सकती है। इसी प्रकार से विवाह उत्सव में लोकगीत तथा संगीत के माध्यम से बिखरने वाला उल्लास अब समाप्त हो चुका है। अब जमाना आर्केस्ट्रा का है। डीजे के साथ डांस फ्लोर पर करतब दिखाने का फैशन है। ऐसा फैशन सिर्फ एक ही दिन में नहीं आया है लेकिन विडम्बना तो यह है कि दिन पर दिन हमारी संस्कृति पर अपनी दखल गहरी कर रहा है। भारतीय संस्कृति में यह ऐसे हिल-मिल गये हैं कि इनमें विभेद करना कठिन हो गया है। वैलेन्टाइन डे की संस्कृति पूर्ण रूप से थोपी गयी संस्कृति है। बाजार खुद के स्वार्थ के लिए ऐसी संस्कृतियों को लगातार प्रोत्साहित कर रहा है। उसका मुख्य उद्देश्य पाश्चात्य संस्कृति के आधार पर लोगों की जेब को ढीला करना है। ऐसा नहीं है कि वैलेन्टाइन डे मनाना अनुचित है लेकिन भारतीय संस्कृति में जिस प्रकार से इसे पेश किया गया है, उससे इसके औचित्य पर प्रश्नचिह्नï लग गया है। भारतीय संस्कृति में पे्रम को विशेष रूप से महत्व दिया गया है। इस संस्कृति में कोई एक दिन प्रेम के लिए निर्धारित नहीं है। यहां तो हर दिन प्रेम का दिन होता है तो उसके लिए 14 फरवरी ही क्यों?
संस्कृति के प्रति बदलती हुई आस्था ने एक नयी चुनौती पेश की है। चुनौती है कि अपनी सांस्कृतिक आस्था को सुरक्षित रखने की। अपनी संस्कृति से विमुख होने का ही परिणाम है कि अब सावन के मौसम में लोकगीत सुनने को नहीं मिलते हैं। हां, बारिश में भीगती हुई बाला पर फिल्माया हुआ रीमिक्स जरूर अहसास करा देता है कि सावन आ गया है। आम की डाली पर रस्सी और रस्सी के सहारे आसमान छू लेने की कोशिश अब कम ही दिखती है। वहीं डिज्नीलैण्ड और फैनलैण्ड में भारी भीड़ जुटती है। देशी झूलों पर विदेशी झूला हावी हो चुका है। लोगों को अब सावन की रिमझिम फुहारों के स्थान पर वाटर पार्क में नहाने में ज्यादा मजा आता है।
देशी अंदाज में रहने की जुगत शायद ही अब कोई करता हो। हर कोई हाईटेक होना चाहता है। एडवांस कहलानेके लिए वह कुछ भी कर सकता है। अपने परम्परा गीतों से छेड़छाड़ करने में उसको कोई परहेज नहीं रहता है। भोजपुरी गीतों की बुरी दशा आज इस कारण से है क्योंकि तोड़-मोड़कर इसे आज इस मुकाम तक पहुंचा दिया गया है कि इसे सार्वजनिक रूप से शायद ही कोई सुनना पसन्द करें। होली पर भोजपुरी गीतों की एक समय में धूम रहती थी। अब होली पर सबसे अधिक द्विअर्थी गीत बनते हैं। इसमें भोजपुरी गीत तो सभी सीमाओं को तोड़ देते हैं।
देश-विदेश की प्रचुर लोक संस्कृति को प्रदर्शित करने का बीड़ा प्रदेश के संस्कृति विभाग के लोककला एवं जनजाति संस्थान ने उठा रहा है। इस संस्थान ने प्रदर्शित किया है कि लोक संस्कृति का कोई जोड़ नहीं है। लोक संस्कृति में ही लोक शक्ति है। ऐसी शक्ति जो किसी को अपना बना सकती है। आवश्यकता तो यह है कि आज लोकसंस्कृति के प्रचार-प्रसार पर विशेष रूप से बल दिया जाय। इस कला के जुड़े लोगों को प्रोत्साहित किया जाय। लोक कलाकारों को भी समाज में मान-सम्मान दिया जाय। उनके खाते में भी पुरस्कार आये। सरकारी स्तर पर ऐसे आयोजन करवाये जाय जिनमें इन ये कलाकार अधिक से अधिक शामिल हो सकें।
आज फिल्मी संगीत और पाश्चात्य संगीत को प्रदर्शित करने वाले तमाम सेटेलाइट चैनल हैं लेकिन लोक संस्कृति से जुड़े कार्यक्रमों के प्रसारण के लिए कोई एक भी चैनल नहीं है। लोक संस्कृति से जुड़े कार्यक्रम दिखाना सिर्फ दूरदर्शन की नैतिक जिम्मेदारी नहीं है। दूसरे ऐसे सेटेलाइट चैनल जो हमारे सांस्कृतिक क्षेत्र में दखल दे रहे हैं उनकी जिम्मेदारी भी हमारी संस्कृति उसे जुड़े कार्यक्रम प्रसारित करने की है। दूरदर्शन का रोना यह है कि केबिल टी.वी. के दौर में उसका प्रसारण ही संभव नहीं हो पाता है। दर्शकों को जो कुछ देखने को मिल रहा है, उसमें अपनी संस्कृति की महक दूर-दूर तक नहीं है। बाजारू माल की तरह निजी सेटेलाइट चैनलों द्वारा कार्यक्रमों को पेश किया जाता है। ऐसे में समाज पर उनका प्रतिकूल प्रभाव पडऩा स्वभाविक ही है।
ऐसा नहीं है कि समय के साथ खुद को बदलना नहीं चाहिए। ...लेकिन उस बदलाव का क्या लाभ जिसमें हम सांस्कृतिक रूप से पतन की राह पर चलने लगें। बदलाव सार्थक दिशा में होना चाहिए। पाश्चात्य संस्कृति की अच्छाइयों को ग्रहण करने में कोई बुराई नहीं है लेकिन फैशन के नाम पर कूड़े-कचरे को बटोरना कहां की बुद्धिमानी है?

प्रस्तुति-रजनीश राज
महिला अधिकारों की चुनौतियां

आज की उपभोक्तावादी संस्कृति में महिलाओं को उत्पाद मान लिया गया है। बाजार समझ चुका है कि उनका उपयोग और उपभोग कहां और कैसे करना है। आश्चर्य का विषय है कि स्वयं महिलाएं बाजार का अंग बनने को तैयार है। इसे उनकी आजदी माने या मजबूरीï? कहना गलत न होगा कि पहले की अपेक्षा समाज में महिलाओं की स्थिति मजबूत हुई है लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलु यह भी है कि बालिका शिशु की संख्या में कमी आज भी बनी हुई है। तमाम कानूनों के बाद भी कोख में बालिका भ्रूण की हत्या का काला सच सामने हैं। ऐसे में लिंग असमानता पर विमर्श जरूरी हो जाता है।
सिर्फ भारत ही नहीं अमरीका जैसे शक्तिशाली देश में भी लड़के और लड़कियों में मतभेद किया जाता है। मतभेद का यह सिलासिला भारत में पुरातन कल से लेकर आज तक किसी न किसी रूप में जारी है। महिला उत्पीडऩ के मुद्दे पर आंख बंद कर यह नहीं समझ लेना चाहिए कि पुरूष हर हाल में सुखी है। पितृसत्ता की अगर बात की जाती है तो उसमें पुरूष भी कहीं न कहीं निशाने पर है। महिलाओं को अधिकार के रूप में दिए गये कई कानूनों का दुरुपयोग कर पुरूषों की असीम सत्ता को चुनौती दी जा चुकी है। दहेज कानून का दुरुपयोग कर पुरूषों को प्रताडि़त करने का उपक्रम भी शुरू हो चुका है। महिला अधिकारों की रक्षा के लिए राज्य और राष्टï्रीय स्तर पर महिला आयोग का गठन किया गया है लेकिन पुरूष आयोग का गठन नहीं हुआ है। शायद इस कारण से भुवनेश्वर में पुरूषों ने यहां के महिला आयोग में शिकायत दर्ज करायी है। उड़ीसा के राज्य महिला आयोग में वर्ष 2001 से 2005 तक 591 पुरूषों की शिकायतें दर्ज करायी गयी हैं।
स्त्री और पुरूष एक ही रथ के दो पहिए हैं। एक भी पहिए को हटाकर समाज का संचालन नहीं किया जा सकता है। आज के भौतिकवादी युग में यह कहने में संकोच नहीं करना चाहिए कि स्त्री का शोषण पुरूषों द्वारा और पुरूषों का शोषण स्त्री द्वारा किया जा रहा है। स्त्री द्वारा स्त्री तथा पुरूष और पुरूष का शोषण अनहोनी नहीं है। मुद्दा यह है कि हम समाज में होने वाले घटनाक्रम को किस नजारिए से देख रहे हैं। सिर्फ शोर मचाने से न किसी को अधिकार मिलने वाले और न ही शोषण समाप्त होने वाला है। स्त्री विमर्श के तमाम मुद्दे तब तक बेमानी हैं जब तक की हम उनके प्रति संवेदनशील नहीं बनते हैं।
महिला अधिकारों के लिए शोर नया विषय नहीं है। यह कहने में परहेज नहीं होना चाहिए कि महिलाओं की दशा में दिन पर दिन सुधार भी हो रहा है। समाज में उनकी स्थिति मजबूत हुई है। अब घंूघट में रहने की विवशता उनकी नहीं है। वे पुरूषों के साथ कदम ताल करती हुई घर से बाहर निकल सकती हैं। तमाम बेडिय़ां खोल वह खुली हवा में उडऩे को बेताब हैं। उनकी यह आजादी कहीं-कहीं पर उनके हित में प्रतिकूल साबित हो रही है। उनको पाश्चात्य की नकली महंगी पड़ रही है। जल्द आगे बढऩे की चाहत में जो शार्टकट एक वर्ग विशेष अपना रहा है, उसका व्यापक परिणाम देखने को मिल रहा है। यह वर्ग यौन उत्पीडऩ तथा बलात्कार का शिकार होने में सबसे आगे हैं। खून के आंसू पीना उनकी मजबूरी हो चुकी है।
निजी तथा सरकारी क्षेत्र में कार्यरत महिलाओं का शोषण न हो सकें, इसके लिए विशाखा फैसले के तहत एक निगरानी समिति बनाने की सिफारिश की गयी थी। इस समिति की जिम्मेदारी थी कि वह निगरानी रखें कि कार्यक्षेत्र में महिलाओं का यौन उत्पीडऩ न हो। कितनी समिति बनी है, यह शोध का विषय हो सकता है। महिलाएं आज हर क्षेत्र में बढ़-चढ़ कर कार्य तो जरूर कर रही हैं लेकिन मानसिक यातनाओं से उनको रोज दो-चार होना पड़ रहा है। कई ऐसे क्षेत्र हैं जहां उनके शोषण की कहानी आम हो चुकी है। फैशन तथा फिल्म की दुनिया में महिलाओं के शोषण की परम्परा पुरानी हो चुकी है। आश्चर्य का विषय तो यह है कि खुद महिलाओं ने नियति मान कर इसे स्वीकार कर लिया है। फिल्मों में बढ़ता अंग प्रदर्शन तथा फैशन के नाम पर परोसी जा रही अश्लीलता इसका परिणाम है।
कामयाबी के शिखर पर पहुंचने के बाद भी उनको महिला होने के नाते आलोचना का शिकार होना पड़ सकता है। टेनिस की खिलाड़ी सानिया मिर्जा को विश्व में भारत का नाम रौशन करने के बाद भी अपनी पसन्द या सुविधा का डे्रस पहनने का अधिकार नहीं है। उनके खेल पर नहीं ड्रेस पर चर्चा प्रमुखता से की जा रही है। ड्रेस कोड के कारण महिलाओं को अपमानित होना पड़ रहा है। खेल के मैदान से लेकर विश्वविद्यालय परिसर तक महिलाओं की ड्रेस कट्टïरपंथियों के निशाने पर है।
पढ़ी-लिखी महिलाएं आज अपने अधिकारों के प्रति जागरूक जरूर है लेकिन सुरक्षित वे भी नहीं है। ऐसा इस कारण से है क्योंकि उपभोक्तावादी संस्कृति में खुद वे उत्पाद को रूप में स्वयं को पेश कर रही है। महिलाओं के ऊपर होने वाले अत्याचार का परिणाम क्या रहता है इसे जेसिका लाल काण्ड से समझा जा सकता है। देश में जेसिका लाल जैसी कितनी महिलाएं होगी जो अखबारों की सुर्खियां बनने से पूर्व कब्र में दफन हो चुकी होगीं।
महिलाओं को उनके अधिकार मिल सकें, इसके लिए महिला आरक्षण की मांग एक समय जोर-शोर से उठी थी। समय के साथ इस मुद्दे को एक ओर रख दिया गया। वास्तव में बिना आरक्षण के महिलाओं का दखल हर क्षेत्र में बढ़ा है। आज शायद ही ऐसा कोई क्षेत्र हो जिसमें महिलाओं ने प्रवेश न किया हो। सत्ता और मीडिया में महिलाओं की संख्या बढ़ी है। इससे उनको अपना पक्ष समाज के सामने रखने में सहायता मिली है।
विवाह पंजीकरण कानून की घोषणा कर एक प्रकार से सरकार ने महिलाओं की स्थिति को और अधिक मजबूत करने का प्रयास किया है। दरअसल सरकारी स्तर पर ऐसे कानून की कमी नहीं है जो महिलाओं के हितों की रक्षा कर सकें लेकिन मजबूरी तो यह है कि महिला उत्पीडऩ के मुद्दे कानून के सामने आ ही नहीं पाते हैं। अंध गलियों में उनकी किस्मत का फैसला कर दिया जाता है।
महिला उत्पीडऩ की रिपोर्ट दर्ज कराना आसान नहीं है। उनके लिए पृथक से महिला थाने की व्यवस्था की गयी है लेकिन ऐसे थानों की स्थिति तो और बुरी है। घरेलु हिंसा की शिकार महिलाओंका दर्द तो घर से बाहर निकल नहीं पाता है। घर के किसी कोने में उनके आंसू दफन होकर रह जाते हैं। घरेलु हिंसा को रोकने के लिए कानून बनाने की मांग लगातार होती रहती है। सवाल यह है कि बिजली के गले में घंटी कौन बांधे? घर में महिलाओं को नये संकट का सामना करना पड़ रहा है। अपने सगे संबंधियों से भी वह सुरक्षित नहीं बची हैं। मानवीय संबंधों में आये गिरावट का परिणाम महिलाओं के पक्ष में स्पष्टï रूप से देखा जा सकता है। नाते-रिश्तों की डोर आज इतनी कमजोर हो चुकी है कि उसको टूट पल भर की देर नहीं लगती है। दंगों में दंगाइयों के निशाने पर भी महिलाएं रहती हैं। शायद हमारी आंखों का पानी मर चुका है। महिलाओं के लिए नया नजारिया चाहिए।

रजनीश राज
चिन्तन


फैशन संस्कृति का फैशन

देश् में एफ टी.वी. आज देश में सबसे अधिक देखें जाने वाले चैनलों में अपनी जगह बना चुका है। इस चैनल के माध्यम से 24 घंटे आपके कमरे में ग्लैमर वल्र्ड मौजूद है। सिर्फ एफ टी.वी. ही क्यों? दूसरे सेटेलाइट चैनल भी ग्लैमर परोसने में पीछे नहीं हैं। धीरे-धीरे ग्लैमर समाज पर हावी होता जा रहा है। 'सादा जीवन उच्च विचारÓ अब सिर्फ पुरानी किताबों में ही पढऩे को मिलता है। देसी परिधानों का महत्व हम भूलते जा रहे हैं। पाश्चात्य परिधानों ने हमारे वार्डरोब में गहरी जगह बना ली है। फैशन की संस्कृति पनपती जा रही है। इस संस्कृति को पालने-पोसने में फैशन शो की भूमिका को कमजोर नहीं माना जा सकता है। कोने-कोने में फैशन शो आयोजितकिए जाने लगा है। ऐसे शो का अस्तित्व क्या होता है, यह बताने की खास जरूरत नहीं है। प्रश्न यह उठता है कि हम किस संस्कृति की ओर उन्मुख होना चाहते हैं? आगे बढऩा किसी को बुरा नहीं लगता है लेकिन अपनी सांस्कृतिक जड़ों से कटने किसी भी दृष्टिï में श्रेष्ठï नहीं हो सकता है। फैशन शो की संस्कृति के नाम पर हम समाज में क्या परोस रहे हैं, इस पर चिन्तन जरूरी हो जाता है।
मिस जम्मू अनारा गुप्ता प्रकरण के बाद देश में फैशन प्रतियोगिताओं के आयोजन पर ही सवाल उठने लगे। दरअसल ऐश्वर्या राय और सुष्मिता सेन के विश्वस्तर पर फैशन प्रतियोगिताओं में कामयाबी प्राप्त करने के बाद युवा वर्ग फैशन प्रतियोगिताओं की ओर आकर्षित हुआ। न सिर्फ ग्लैमर बल्कि दौलत और शौहरत भी उनको इस क्षेत्र में नजर आने लगा। अंतर्राष्टï्रीय स्तर पर ऐश व सुष्मिता की कामयाबी के बाद क्षेत्रीय स्तर पर छोटे-छोटे फैशन प्रतियोगिताओं की होड़ लग गयी। यह फैशन उद्योग के फलने-फूलने का समय है। फैशन शो ने इस उद्योग को विस्तार देने का दम भरा हुआ। इसका परिणाम है कि देखते ही देखते फैशन शो को प्रायोजित करने की होड़ शुरू हो गयी। बड़ी-बड़ी कंपनियां फैशन शो तथा प्रतियोगिता के लिए दिल खोलकर खर्च करने लगे। शुरूआत में इसमें कोई बुरायी नजर नहीं आयी लेकिन खेल तो तब शुरू हुआ जब इन कंपनियों ने एक साथ कई निशाने लगाने शुरू किए। कंपनी के अधिकारी फैशन प्रतियोगिता को प्रयोजित कर इसमें निर्णायक भी बनने लगे। यहां तक तो फिर भी ठीक था, उसके बाद उनके अपने प्रतिभागी इस शो में उतरने लगे। प्रतियोगिता में कोई भी प्रतिभागी श्रेष्ठï हो लेकिन उनका अपना प्रतिभागी ही जीतता। ऐसे में श्रेष्ठï प्रतिभागियों में हलचल होना स्वाभाविक है। शो के दौरान उनका विरोध खुलकर सामने आने से ऐसी फैशन प्रतियोगिताओं के अस्तिव पर ही प्रश्नचिह्नï लगने लगा है।
कहने को तो फैशन प्रतियोगिताओं में कई चीजों के प्रतिभागियों की बुद्धिमत्ता को भी परखा जाता है लेकिन ब्यूटी यहां ब्रेन के ऊपर रहता है। प्रकृति की बनायी किसी कृति का आकलन करना सरल नहीं है। मैच फिक्सिंग की तरह सौन्दर्य प्रतियागिताएं भी फिक्स होने लगी हैं। छोटी प्रतियोगिताओं में यह खेल छोटे रूप में होता है और बड़ी प्रतियोगिताओं में बड़े रूप में। इसके अपवाद हो सकते हैं लेकिन कुल मिलाकर फैशन प्रतियोगिताओं की इस सच्चायी को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता है। क्षेत्रीय स्तर पर तो फैशन प्रतियोगिताओं को कमायी का माध्यम बना लिया गया है। संस्थाएं अलग-अलग टाइटिल से फैशन प्रतियोगिता आयोजित करने लगी है। इन प्रतियोगिताओं में उनके अपने निर्णायक होते हैं जो उनको ही जीताते हैं जिसको जीताने चाहते हैं। प्रतियोगिताओं में इंट्री के नाम पर शुल्क लेते हैं तो साथ ही जीताने के लिए अलग से राशि तय रहती है। एक फैशन प्रतियोगिता में कई टाइटिल होने लगे हैं। उद्देश्य एक मात्र पैसे कमाने का है। ...और तो और अब उत्पादों के नाम से फैशन प्रतियोगिताएं आयोजित होने लगी हैं। कंपनियां जानती हैं कि मीडिया फैशन प्रतियोगिताओं के प्रति साकारात्मक रूख रखती हैं। ऐसी प्रतियोगिताओं को मीडिया में पर्याप्त जगह मिलती है। जितना वे विज्ञापन पर खर्च करते हैं उससे कहीं कम खर्च फैशन प्रतियोगिता पर आता है और मीडिया का प्रोत्साहन कहीं अधिक मिलता है। फैशन प्रतियोगिताओं पर बाजारवाद हावी होने का प्रतिकूल प्रभाव देखने को मिल रहा है।
प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह ने तो फैशन प्रतियोगिओं को अश्लीलता का परिचायक मानते हुए रोक तक लगा दी थी। उस समय से फैशन शो के लिए मानक तैयार करने चर्चा चल रही है लेकिन आज तक हुआ कुछ खास नहीं। एक जैसे टाइटिल को लेकर कई प्रतियोगिताएं आयोजित की जा रही है। प्रतिभागी परेशान और दिग्भ्रमित है। असली प्रतियोगिता कौन सी है। किस प्रतियोगिता को वह सही माने और किसे गलत।
शासन-प्रशासन की जिम्मेदारी बनती है कि फैशन शो या प्रतियोगिता के नाम पर धंधा करने वालों पर अंकुश लगाये। अनारा काण्ड के बाद आंखे खुल जानी चाहिए। फैशन आयोजन के नाम पर कहीं कोई दूसरा धंधा अवैध रूप से न चले, इस पर भी ध्यान रखा जाना चाहिए। भोली-भाली लड़कियों का शोषण ऐसे आयोजन के माध्यम से न हो इसके लिए जरूरी है कि कुकुरमुत्तों की तरह उगने वाली संस्थाओं पर अंकुश लगाया जाय। फैशन प्रतियोगिताओं के लिए कुछ नियम तय किए जाय। इन प्रतियोगिताओं में पारदर्शिता रखने का प्रयास भी होना चाहिए। फैशन आयोजन में अपनी संस्कृति को भी प्रोत्साहित करना चाहिए। भारतीय परिधान किसी भी मायने में विदेशी परिधानों से पीछे नहीं है। इन परिधानों से भी ग्लैमरस लुक कम नहीं है। खादी को फैशन को जोडऩे की मुहिम शुरू हुई है लेकिन यहां भी व्यवसायिकता और ग्लैमर अधिक हावी है। लखनऊ के चिकनकारी पूरी दुनिया में मशहूर है। फैशन आयोजन इसे भी प्रोमोट करने का माध्यम होने चाहिए। फैशन के नाम पर अधकचरा नहीं परोसा चाहिए। यह नहीं भूलना चाहिए फैशन उद्योग अभी अपनी शिशु अवस्था में है।


रजनीश राज
चिन्तन

छात्र राजनीति की बदली नीति

छात्र राजनीति इस समय सबसे बुरे दिन से गुजर रही है। छात्रनेता खुद अपने पांव पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं। ये वे छात्रनेता है जो छात्र राजनीति का वास्तविक अर्थ समझ ही नहीं पाय है या कहें कि समझना ही नहीं चाहते हैं। कहते हैं कि एक गन्दी मछली पूरे तालाब को गंदा करती है लेकिन यहां तो पूरे कुंए में ही भांग पड़ी है। छात्रनेता का अर्थ आज के समय में माफिया होने से कम नहीं है। शायद यही कारण है कि आज का आम छात्र छात्रसंघ की राजनीति से दूर रहने लगा है। उसे छात्रसंघ चुनावों से कोई सरोकार नहीं कर रह गया है। अगर अब भी छात्र राजनीति की परिभाषा को सुधारा नहीं गया तो वह दिन दूर नहीं कि जब छात्रनेता को लोग अछूत समझने लगेंगे। छात्रसंघ उनके लिए बदनाम अड्डïा बन चुका होगा।
कहते है कि अति किसी भी चीज की बुरी होती है। छात्रनेताओं ने अपने कुछ निजी स्वार्थों के लिए छात्र राजनीति की पहचान ही बदल दी है। छात्र राजनीति से दलगत राजनीति जुड़ गयी है। छात्रनेताओं का अस्तित्व जब से विश्वविद्यालय-महाविद्यालय के बाहर होने लगा है, तब से विषम परिस्थिति पैदा हो चुकी है। युवा शक्ति से कुछ भी करावाया जा सकता है लेकिन छात्रनेता के रूप में यह शक्ति विध्वंस कार्यों में लगी है। गुण्डागर्दी की नयी परिभाषा गढऩे का काम छात्रनेताओं द्वारा बख्ूाबी किया जा रहा है।
दरअसल आज छात्र राजनीति की शुरूआत ही हिंसा की बुनियाद से होती है। चुनाव में लडऩे के लिए जबरन चन्दा वसूलने से लेकर विजय के बाद सरकारी ठेकों को हासिल करने के लिए उनके द्वारा जो तरीके अपनाये जाते हैं उसे कहीं से भी सही नहीं ठहराया जा सकता है। छात्र राजनीति की नीति अब छात्रों की समस्याओं को सुनने और समझने के स्थान पर बाहुबली और धनपति बनने की अधिक हो गयी है। छात्र राजनीति का आदर्श स्वरूप शिक्षा परिसर में शैक्षिक तथा सांस्कृतिक माहौल स्थापित करने का है। छात्र समस्याओं का प्रतिनिधित्व विश्वविद्यालय-कालेज प्रशासन के समक्ष करने में उसकी महती भूमिका थी। छात्रनेता प्रशासन तथा छात्रों के बीच का सेतु माना जाता था। अब परिस्थितियां बदल चुकी है।
विश्वविद्यालय तथा महाविद्यालय का माहौल पूरी तरह से बदल चुका है। कहीं का प्रोफेसर अपनी छात्रा के साथ प्रेम प्रसंग में पड़ जाता है तो कहीं के छात्रनेता अपने कुलपति के दुश्मन बन जाते हैं। ऐसा नहीं है कि सिर्फ छात्रनेता ही इस परिवेश में बिगड़े हो आम छात्रों को भी बदले जमाने की हवा लग चुकी है। शिक्षा के परिसर को उन्होंने प्रेम का अड्डïा बना रखा है। यहां के माहौल को देखकर ऐसा लगता है जैसे फैशन परेड हो रही है। इसका व्यापक असर देखने को मिल रहा है। शिक्षा के प्रति छात्रों का रूझान कम होता जा रहा है। शैक्षिक माहौल विश्वविद्यालय में समाप्त होता जा रहा है। इन सबके बीच छात्र राजनीति ने बेड़ा गर्क कर दिया है।
छात्रनेताओं ने परिसर के माहौल को बिगाडऩे में अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ी है। छात्रावास माफियाओं की शरणस्थली बन चुके हैं। यहां बम-कट्टïे मिलेंगे तो शराब- दारू की बोतलें भी। नितप्रति छात्रावास में संघर्ष की कहानी आम हो चुकी है। ऐसे में यहां रहकर पढ़ायी की उम्मीद करना बेमानी होगी। इसे छात्रों का दुर्भाग्य ही कहा जायेगा। छात्रावास इस उद्देश्य से बनाये जाते थे कि दूर-दराज से आने वाले छात्र कम खर्च में रूक कर अपनी पढ़ाई को सुचारू रख सकें। विडम्बना तो यह है कि छात्रावास में प्रवेश भी दबंग छात्रों को मिल पाता है। छात्रनेता बनने के लिए छात्रावास में प्रवेश को जरूरी माना गया है।
छात्रसंघ की कुर्सी कभी कितनी महत्वपूर्ण नहीं हो सकती कि उसके लिए खून-खराबे किया जाय। दरअसल छात्रसंघ में कुर्सी मिलने के बाद सक्रिय राजनीति में पहुंचने की राह आसान हो जाती है। छात्रसंघ के चुनावों पर अब राजनीतिक दलों की सीधी नजर रहने लगी है। दल विशेष अपने समर्थित उम्मीदवारों को छात्रसंघ चुनाव में उतारने लगे हैं। ऐसे में छात्रसंघ चुनाव विश्वविद्यालय या महाविद्यालय मात्र में सीमित नहीं रह गये हैं। चुनाव के रंग में पूरा शहर रंग जाता है। इस चुनाव में लाखों की रकम फूंक दी जाती है। इस रकम को जुटाने के लिए छात्रनेता द्वारा वसूली की जाती है और इनका निशाना बनते हैं व्यापारी। कहने का औचित्य यहां यह है कि ऐसी छात्र राजनीति से सिर्फ छात्र प्रभावित नहीं हो रहा है। कहीं न कहीं आम आदमी भी त्रस्त है। जरूरी यह हो चुका है कि छात्रसंघ चुनावों के लिए नये नियम बनाये जाय। न्यायालय द्वारा छात्रसंघ चुनाव के लिए समय सीमा का निर्धारण कर श्रेष्ठï कदम उठाया गया है। यह निर्णय भी होना चाहिए कि कोई भी छात्र लगातार पांच साल से अधिक किसी विश्वविद्यालय का छात्र न सकें। होता यह है कि विश्वविद्यालय की राजनीति में सक्रिय रहने के लिए छात्रनेताओं द्वारा अलग-अलग कोर्स में प्रवेश ले लिया जाता है। उनका उद्देश्य कहीं से भी शिक्षा अर्जन का नहीं होता है। सिर्फ और सिर्फ राजनीति करने के लिए विश्वविद्यालय का प्रयोग करने की इजाजत किसी को नहीं दी जानी चाहिए। छात्रसंघ चुनाव में शामिल होने के लिए शैक्षिक योग्यता को भी तय किया जाना चाहिए। एक तय अंक प्रतिशत प्राप्त करने वाले छात्रों को ही छात्रसंघ चुनाव लडऩे का मौका मिलना चाहिए। अगर पढ़े-लिखे छात्र छात्रसंघ में शामिल होंगे तो स्थिति में कमोवेश सुधार आयेगा। उनकी रुचि शैक्षिक संस्थान के वातावरण को सुधारने की रहेगी। यह भी तय होना चाहिए कि राजनीतिक दल छात्रसंघ चुनाव में दखल न दें। छात्रसंघ चुनाव के दौरान प्रचार परिसर के बाहर न किया जाय। खर्च की सीमा को भी नियत किया जाय। शिक्षा के मंदिर की पवित्रता को हर कीमत पर बनाये रखना जरूरी है। इस पवित्रता को दूषित करने का अधिकार किसी को नहीं है। शिक्षा के परिसर को राजनीति का अखाड़ा बनाना किसी भी दृष्टिï से उचित नहीं है।


प्रस्तुति-रजनीश राज



चिन्तन

मीडिया और महिला


मीडिया पर महिला छवि को धूमिल का आरोप लगने लगा है। महिला विषयक मुद्दों पर उससे और अधिक संवेदनशील होने की बात कहीं जा रही है। दूसरी तरफ उस मीडिया की सराहना इस रूप में हो रही है कि महिलाओं पर होने वाले हिंसा की सही तस्वीर उसके द्वारा पेश की जाने लगी है। दोनों बातें कहीं न कहीं कुछ न कुछ विरोधाभास जरूर प्रकट करती हैं लेकिन हैं सच हैं। दरअसल महिलाओं को दोहरेा रूप में मीडिया पेश कर रहा है। उसके एक रूप में खुद को मार्डन कहने वाली, बेबाक बयान और चर्चा में रहने वाली नारियां हैं। ऐसी नारियां जो बाजार के इशारे पर काम करती है तो दूसरी ओैर समाज की शोषित, उपेक्षित, पीडि़त महिलााएं। मीडिया बाजार की शक्तियों के प्रभुत्व में हर कर भी इन दोनों ही रूपों को स्थान दे रहा है लेकिन अपेक्षा कहीं और अधिक की है।
मीडिया पर स्त्री छवि को बदरंग करने का का आरोप लगाने से पूर्व कई बिन्दुओं पर चिन्तन जरूरी हो जाता है।लगाया जाता है। यहां यह नहीं भूलना चाहिए कि मीडिया समाज का प्रतिरूप होता है। समाज में जो जैसा दिखता है या होता है, उसे मीडिया सार्वजनिक कर देता है। इधर कुछ सालों में मीडिया ने महिलाओं के जिस रूप को प्रस्तुत कर किया है, वह समाज में आये बादलाव का ही आइनाप्रतिरूप है। समाज में आये खुलेपन को मीडिया ने जगह दी है। सच है जो बिकता है वहीं छपता है या दिखाया जाता है। आज का समाज पुरापंथी दो दशक पुरानेवाला समाज नहीं रह गया है। समाज में क्रांतिकारी बदलाव आया है। महिलाएं घर से बाहर निकलकर पुरूषों के कंधे से कंधा मिलाकर काम करने लगी हैं। घर-परिवार में उनको पहले की अपेक्षा अधिक आजादी मिली है। रहन-सहन के साथ ही उनके पहनावे में भी परिवर्ततन आया है। अब घंूघट में रहने की विवशता उनकी नहीं है। अगर मीडिया उनके इस खुलेपन को रेखांकित कर रहा है तो इसमें गलत क्या है?
महिला संगठनों का आरोप लगता है कि मीडिया महिलाओं को 'आइटमÓ और 'चीजÓ के रूप में पेश कर रहा है। गौरतलब है कि अब जब खुद उनको आइटम गर्ल कहलाने में संकोच नहीं है तो मीडिया परहेज क्यों करें? कटु सच है कि मीडिया मसाला परोसने से बचा नहीं रह सकता है। आखिरकार मीडिया मिशन के साथ बिजनेस भी तो कर रहा है। उसके आगे भी बाजार है। सवाल यह भी है कि ऐसी महिलाओं की लड़ाई लडऩे पर महिला संगठन उतारू क्यों है जो पहले से ही सशक्त हैं। दरअसल ऐसी महिलाओं का उद्देश्य ही होता है कि मीडिया उनको इस रूप में पेश करें। उनको मालूम है कि उनके इस रूप से ही उनको काम मिलने वाला है। अगर उनको चर्चा में रहना है तो भी इस तरह के दांव-पेंच करने ही होंगे। उनको अंग प्रदर्शन से कोई गुरेज नहीं है। मीडिया पर आरोप लगाने से पूर्व महिला संगठनों को उन महिलाओं को निशाने पर लेना चाहिए जो मीडिया को उत्तेजक पोज या बयान देती हैं। वास्तव में महिलाओं की छवि को धूमिल करने की असली गुनाहगार तो खुद वह ही हैं। मीडिया तो माध्यम मात्र है।
मीडिया महिलाओं की आवाज उठाने का सशक्त माध्यम बना है। कन्या भ्रूण हत्या से लेकर महिला हितों से जुड़े तमाम मुद्दों को मीडिया मंच देता है। कन्या भ्रूण हत्या जैसे घिनौने कृत्य पर सबसे अधिक पैनी निगाहें मीडिया की रहती है। दूर-दराज के गांवों में होने वाले अन्यायों को बुलन्द करने का काम भी मीडिया द्वारा किया जा रहा है। यह सच है कि उसके इस काम में काफी संभावनाएं हैं लेकिन मुहिम तो शुरू ही हो चुकी है। महिला विषयक किसी भी प्रकार के मुद्दे मीडिया की प्राथमिकता पर रहते हैं। जरूरी है कि मीडिया अपने दायरे में विस्तार करें। महिला संगठनों की बैशाखी उसे महिला हितों के मुद्दे उठाने में सहायता जरूर देती है लेकिन उसे चौथे स्तंभ की जिम्मेदारी को भी पूरी करनी है। मीडिया सामाजिक कार्यकर्ता से अग्रणीय भूमिका का निर्वाह कर सकता है। अगर उसकी सीमाएं हैं तो कई छूट भी उसे मिली हुई।
यह सच है कि घर के अंदर जाकर पीडि़त महिला की दास्तां को वह उजागर नहीं कर सकता है लेकिन ऐसे बिन्दुओं की ओर संकेत जरूर कर जो महिलाओं के लिए मददगार साबित हो। महिला समाख्या द्वारा पिछले दिन आयोजित महिला हिंसा रोकने में मीडिया की भूमिका विषयक कार्यशाला में यह प्रस्ताव आया कि महिलाओं को दिए गये अधिकारों का अधिक से अधिक प्रचार-प्रसार मीडिया के माध्यम से हो। अगर मीडिया किसी विषय को उठाये तो उसका फालोअप भी पूरी जिम्मेदारी के साथ करें। मीडिया के माध्यम से लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती है लेकिन, वह मजबूत साथी जरूर साबित हो सकता है। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि बाजार मीडिया पर भी हावी है फिर भी स्थिति अभी तक इतनी घातक नहीं हुई है कि काबू में न रह सकें।
जेसिका लाल, प्रियदर्शिनी मट्टïू, इमराना, मेहर भार्गवर्व काण्ड में मीडिया की साकारात्मक भूमिका की हर ओर तारीफ हुई है। वास्तव में बिना मीडिया की मदद के इन पर हुए जुल्मों की लड़ाई को आसानी से लड़ा नहीं जा सकता था। ऐसे तमाम मामले अभी तक गुमनामी में है जिजिनको अगर मीडिया की रौशनी मिल जाय तो न्याय हो सकता है। मीडिया को चकाचौंध के पीछे भागने की नियति से बचना चाहिए। आम महिलाओं की आवाज को मुखर का प्रयास उसका होना चाहिए। महिला विषयक मुद्दों पर सिर्फउसे मसाला नहीं ढूंढना चाहिए।
मीडिया का दायित्व महिला स्वास्थ्य विषयक जानकारी प्रचारित करने का भी है। महिलाओं के जीवन यापन में आये बदलाव के बाद भी बड़ी संख्या में महिलाएं कुपोषण का शिकार हो रही हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में तो स्थिति ओर बुरी है। मीडिया को उन तक पहुंच बनानी होगी। प्रसवकाल के दौरान भी बड़ी संख्या में महिलाएं असमय मौत का शिकार होती हैं। मीडिया तो इस ओर भी जागरूकता फैलानी चाहिए। प्रसव के समय क्या-क्या सावधानी रखनी चाहिए, अगर इसका प्रचार मीडिया करें तो कमोवेश स्थिति में कुछ सुधार लाया जा सकता है। महिला शिक्षा की ओर भी मीडिया का रुख होना चाहिए। सिर्फ सौन्दर्य की देवी मान महिलाओं का चित्रण मीडिया को नहीं करना चाहिए।

रजनीश राज

सिने संसार की चुनौतियां

सिनेमा का सुनहरा पर्दा कई चुनौतियों को झेलते हुए किसी तरह अपनी चमक बचाये हुए हैं। सिने संसार में कई ऐसे कांटे हैं जो कभी भी जख्मी कर सकते हैं। उनकी चुभन बॉलीवुड महसूस करने लगा है। बॉलीवुड को पाइरेसी का दीमक चट करता जा रहा है। पाइरेसी से सिनेमा दर्शकों को सिनेमाहॉल जाने से रोक कर रखा है। एकल स्क्रीन वाले सिनेमाहॉलों के लिए तो यह और भी संकट की घड़ी है। मल्टीप्लेक्स आ जाने के बाद एकल स्क्रीन वाले सिनेमाहॉल घाटे का पर्याय बन चुके हैं। इनके अस्तित्व को बचाये रखना आज के परिवेश में काफी कठिन लग रहा है। केबिल टी.वी. के फैले मकडज़ाल के बीच भी सिनेमा को घाटे से उबारने का प्रयास सरल नहीं है। संकट न सिर्फ बॉलीवुड बल्कि सिनेमाहॉलों पर भी मंडरा रहा है।
गौरतलब है कि धीरे-धीरे देश में मल्टीप्लेक्स संस्कृति विस्तार लेती जा रही है। इस संस्कृति के विस्तार के बाद भी सिनेमा दर्शक कम हो रहे हैं। इसके पीछे का मुख्य कारण पाइरेसी है। नयी फिल्मों की सीडी प्रदर्शन के समय या कभी-कभी तो रिलीज होने से पहले ही बाजार में आ जाती हैं। इस कारण से सिनेमा के महंगे टिकट के स्थान पर लोग अब घरों में ही मूवी देखना अधिक पसन्द कर रहे हैं। छोटे जिलों के मुकाबले बड़े शहरों से दर्शकों की संख्या अधिक कम हो रही है। बड़े शहरों में पाइरेटेड सीडी आसानी से उपलब्ध हैं।
पाइरेटेड सीडी के कारण हर वर्ष करोड़ों रुपये का नुकसान बॉलीवुड को उठाना पड़ रहा है। उसके बाद भी सुभाष घई जैसे शीर्ष के फिल्मकार कहते हैं कि पाइरेसी को रोकना शासन और प्रशासन का काम है। निश्चित रूप से फिल्मकारों को भी पाइरेसी के खिलाफ आवाज उठानी होगी। तमिलनाडु में पाइरेसी से निपटने के लिए सरकार के इसे गुण्डा एक्ट में डाल दिया है। अगर कोई पाइरेटेड सीडी का करोबार करता है तो उस पर गुण्डा एक्ट लगाकर कार्रवाई की जाती है। फिल्म उद्योग से जुड़े लोगों को भी पाइरेसी को लेकर सावधान रहना चाहिए। फिल्म के अधिकार बेचने को लेकर उनकी सर्तकता भी पाइरेसी की समस्या को कम कर सकती है। पाइरेसी के कारण सिनेमाहॉलों से विमुख हुए दर्शकों को मल्टीप्लेक्स के माध्यम से सिनेमा से जोडऩे की नयी मुहिम शुरू की गयी है लेकिन मल्टीप्लेक्स एक खास वर्ग तक ही सीमित हैं। फिल्मों का असली दर्शक जो निचले तबके का है वह मल्टीप्लेक्स से दूर ही रहता है। कारण यह है कि उसको यहां आने में न सिर्फ संकोच है बल्कि उनकी जेब यहां के महंगे टिकट को स्वीकार नहीं कर सकती है। एक प्रकार से सिने संसार में दर्शकों का विभाजन कई स्तर पर हो चुका है। एक दर्शक वह है जो घर पर पाइरेटेड सीडी से फिल्मों का आनन्द लेता है, दूसरा दर्शक वर्ग मल्टीप्लेक्स के चकाचौध में है चुनी हुई फिल्मों को ही देखना पसन्द करता है और तीसरा वर्ग एकल स्क्रीन को जिन्दा रखें हुए हैं। एक वर्ग ऐसा भी है जो केबिल टी.वी. के विस्तार कारण सिनेमाहॉल की ओर रूख करने का प्रयास ही नहीं करता है। केबिल पर पाइरेटेड सीडी के माध्यम से इस वर्ग के दर्शकों को हर नयी और पुरानी फिल्म का मजा मिल जाता है। सिनेमा मालिकों ने लाख बार सरकार से अनुरोध किया कि केबिल पर नयी फिल्मों का प्रसारण से रोका जाये लेकिन इसके बाद भी स्थिति में फिल्मों का प्रसारण जारी है। इससे केबिल जगत तो सम्पन्न हुआ है लेकिन सिनेमा संसार को धक्का लगा है। उसके दर्शक इस कारण भी सिनेमाहॉल से दूर हुए हैं। इन दर्शकों को आकर्षित करने के लिए मल्टीप्लेक्स का जाल बिछाया जा रहा है। प्रदेश में मल्टीप्लेक्स संस्कृति के विस्तार का कारण है कि इससे सरकार द्वारा हर प्रकार की छूट उपलब्ध करायी जा रही है। इस छूट के एवज में सिनेमा मालिकों द्वारा भी अपने लिए सुविधाओं की मांग की जा रही है। उत्तर प्रदेश सिनेमा एक्जीबिटर्स फेडरेशन ने प्रदेश सरकार से सिनेमाहॉलों को मल्टीप्लेक्स या सिनेप्लेक्स बनाने की दशा में पांच वर्ष के लिए मनोरंजन कर की छूट देने की मांग कर रखी है। सिनेमाहॉल के स्थान पर मल्टीप्लेक्स बनाने वालों को पांच वर्ष के लिए मनोरंजन कर में छूट देने का प्रावधान नहीं रखा गया है। सिनेमा लाइसेंस की फीस को कम कर दिल्ली की तर्ज पर 250 रुपये करने की मांग भी की गयी है।
मनोरंजन कर विभाग के मोटे अनुमान के अनुसार पिछले एक साल में प्रदेश से 32 लाख दर्शक कम हो चुके हैं। अकेले लखनऊ ने 85 हजार दर्शक खो दिए हैं। दर्शकों की कमी मनोरंजन कर विभाग के लिए खतरे की घंटी है। सिनेमाहॉलों के दर्शक एक ओर कम हो रहे हैं तो दूसरी और सिनेमाहॉल बेहाल हो रहे हैं। सिनेमामालिकों के लिए वास्तव में अच्छी खबर होगी अगर उनको अपना सिनेमा तोड़कर कुछ भी बनाने की अनुमति मिल जाये। वर्तमान में नियम ऐसा है कि सिनेमाहॉल को तोड़ कर उनके स्थान पर कुछ और बनाया ही नहीं जा सकता है। हर हॉल में सिनेमाहॉल चलाना ही है। अगर सिनेमा नहीं चल रहा है तो भी उसको तोड़ा नहीं जा सकता है।
प्रदेश में 15 नवम्बर 2002 से मनोरंजन कर की दर सिनेमा व्यवसाय के लिए एक समान 60 प्रतिशत कर दी गयी थी। पूर्व में प्रदेश में सौ तथा 60 प्रतिशत का कर वसूला जा रहा था। जिन सिनेमाहॉल ने तीन वर्ष तक सिनेमा टिकटों के मूल्य में कोई वृद्धि न करने का वादा किया था, वहां 60 प्रतिशत तथा शेष में सौ प्रतिशत का मनोरंजन कर लागू था। एक समान 60 प्रतिशत कर देने से उम्मीद की जा रही थी कि सिनेमा टिकटों के दामों में कमी होगी और दर्शकों की संख्या में बढ़ोत्तरी होगी। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। कर कम करने के बाद भी दर्शक महंगे टिकटों के कारण सिनेमाहॉलों से दूर रहे हैं।
सिनेमा के विकल्प आप उनके पास उपलब्ध हैं। सीडी के अवैध करोबार ने सिनेमा का कारोबार काफी हद तक प्रभावित किया है। लोगों ने सिनेमा के स्थान पर घर में सीडी पर फिल्म देखने को सुखद साधन मान लिया है। आज हर नई फिल्म की सीडी वीडियो लाइब्रेरी में उपलब्ध है। इस कारण से प्रदेश में वीडियो लाइब्रेरी की संख्या बढ़ी है। प्रदेश में इस समय छह हजार से ज्यादा वीडियो लाइब्रेरियां हैं। प्रदेश में पिछले साल वाराणसी और गोरखपुर में वीडियो लाइब्रेरी की संख्या दुगुनी से अधिक हुई है। वीडियो लाइब्रेरी और प्रदेश के बाजारों में खुले आम पाइरेटेड सीडी बिकती है और पुलिस प्रशासन गहरी निंद्रा में रहता है।
सिनेमाहॉलों के सामने दर्शकों के संकट के साथ ही नयी फिल्मों को प्राप्त करने की चुनौती रहती है। छोटे या माध्यम दर्जे के सिनेमा मालिकों की विवशता है कि बड़े बजट की फिल्मों को वे मिनिमम गारंटी (एमजी) देकर प्राप्त नहीं कर सकते हैं। रिपीट रन (प्रदर्शित फिल्मों का पुन: प्रदर्शन) से वे दर्शकों को जुटा नहीं सकते हैं। ऐसे में उनके सामने एक ही विकल्प रह जाता है, व्यस्कों के लिए फिल्म का प्रदर्शन। दर्शकों को आकर्षित करने के लिए इन फिल्मों में ब्लू फिल्म के दृश्यों को भी डाला जाता है। यह फिल्में भी कुछ दिन की मेहमान होती हैं। अच्छी कहानी पर फिल्म न आने के कारण भी सिनेमाहॉल का संकट गहरा रहा है। खुद फिल्म निर्माता मानने लगे हैं कि तकनीक के विस्तार होने के बाद फिल्म की कहानी की ओर कम ध्यान दिया जाने लगा है। अगर समय रहते इन संकटों की ओर ध्यान नहीं दिया गया तो पानी सिर के ऊपर से गुजर सकता है।

प्रस्तुति-रजनीश राज
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चिन्तन

समाज पर हावी बाजार

अतिश्योक्ति नहीं है कि बाजार समाज पर हावी होता जा रहा है। अब बाजार तय करने लगा है कि हमारी 'लाइफस्टाइलÓ क्या होगी। पूर्व में स्थापित सामाजिक मान्यताओं को नया रूप में देने में बाजार का योगदान मुख्य रूप से प्रदर्शित हो परिलक्षित होता है। कहना गलत न होगा कि बाजार के इस रूख को हवा देने में मीडिया का योगदान मुख्य रूप से रहता है। बाजार के विस्तार मीडिया मण्डी बन चुका है।
बाजार नित नये फण्डे को पेश कर रहा है। बाजार एक मात्र उद्देश्य येन-केन प्रकारेण ग्राहकों को प्रलोभित करता है। नये प्रलोभन में कई बार बाजार ग्राहकों को बेवकूफ बनाने में भी पीछे नहीं रहता है। वैश्विकरण के दौर में बाजारवाद का विकास हुआ है। आज बाजार का फार्मूला लोगों की आवश्यकताओं में विस्तार करने का भी है। बाजार नित प्रति कई योजनाएं पेश कर रहा है कि उपभोक्ता उसके चंगुल में फंसे बिना नहीं रह पाता है। बाजार के विस्तार के फलस्वरूप बहुराष्टï्रीय कंपनियों का दखल भारतीय बाजारों में बढ़ता जा रहा है। बाजार के इस चंगुल से निकलना अब आसान नहीं लगता है।
अब बाजार तय करने लगा है कि हमारे पर्व तथा त्यौहार कैसे मनाये जायेंगे। बाजार ऐसे प्रचारित करता है कि मानो दीपावली पर इलेक्ट्रानिक मशीन या कोई गाड़ी खरीदे बिना पर्व अधूरा ही रह जायेगा। करवा चौथ के व्रत पर पत्नी को उपहार देने का प्रचलन बाजार ने ही शुरू किया है। ऐसा लगता है कि अगर करवा चौथ पर उपहार नहीं दिया जायेगा तो पति-पत्नी के बीच का प्यार कम हो जायेगा। भाई-बंधन के पर्व पर भी बाजार विशेष रूप से सक्रिय हो जाता है। बाजार को सदैव इंतजार रहता है पर्व और त्यौहार का। बाजार का मायाजाल ही है कि अब पितृपक्ष में भी लोग जब तक खरीदार करने लगे हैं। धार्मिक आयोजनों पर होने वाले कार्यक्रमों को कंपनियों द्वारा प्रायोजित भी इस उद्देश्य से किया जाता है कि ग्राहक उसकी ओर आकर्षित हो सकें। पर्व विशेष पर आकर्षण योजनाओं को बाजार में उतारा जाता है। तीन के साथ दो फ्री। एक की खरीद पर दूसरा बिल्कुल मुफ्त और 50 प्रतिशत की छूट। मानो ऐसा प्रतीक होता है कि बाजार उपभोक्ताओं के प्रति उदार हो चुका है। वास्तव में ऐसा नहीं है। घाटे का सौदा बाजार कभी नहीं करेगा। उसका उद्देश्य को ग्राहकों को शुद्ध रूप से प्रलोभित करने का होता है। ग्राहक संख्या बढ़ाने का ध्येय सर्वप्रथम है।
तय बात है कि बाजार में प्रतियोगिता बढ़ी है। ग्राहकों को एक ही उत्पाद के कई विकल्प मिलने लगे हैं। दूसरी ओर इन विकल्पों के अंकगणित में आसानी से ग्राहक वर्ग ऐसा फंसता है कि उसका बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है। बाजार को उन्नत करने में फाइनेंस कंपनियों की महती भूमिका साबित हुई है। ऐसा लगता है कि उसकी भूमिका महादानी की हो गयी है। बिन मांगे ही लोन मिलने लगा है। पैसा चाहिए-हमारे पास आइये। ऐसा लगने लगा है कि आज के समय में पैसा प्राप्त करना सबसे सरल काम हो गया है। यह अलग बात है कि सरल फाइनेंस सुविधा का लाभ लेने के बाद ग्राहक जीवन भर कर्ज के बोझ से दबा रहता है। आज हर तीसरा आदमी किसी न किसी प्रकार से कर्ज में डूबा हुआ है।
जीवन शैली में आये बदलाव के कारण अब जल्द से जल्द सब कुछ प्राप्त कर लेने की इच्छा लोगों में घर कर चुकी है। बाजार इस प्रवृत्ति का पूरा-पूरा फायदा उठा रही है। मीडिया को बाजार ने हथियार बनाया है। प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप में भी मीडिया बाजारवाद को प्रचारित करने में आगे रहता है। फिल्म तथा धारावाहिकों में भी उत्पाद का प्रचार होने लगा है। उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ ग्राहकों को आकर्षित करने का होता है। समय को देखते हुए विज्ञापन ने भी अपने तेवर बदले हैं। विज्ञापन उत्पाद को ऐसे पेश करते हैं कि वे जरूरत के रूप में सामने आते हैं। इन विज्ञापन को देखकर ऐसा लगता है कि बिना इसके जीवन पूर्ण नहीं हो सकता है।
बाजार लोगों की भावनाओं का बिजनेस करने में भी पीछे नहीं है। बाजार में दिल की कोमल भावनों को प्रदर्शित करते ग्रीटिंग कार्डों की कोई काट आज भी नहीं है। इन कार्डों के बाजार को न ई- कार्ड मार पाये और न छोटे-छोटे अवसर पर भेजे जाने वाले एसएमएस ही। यह अलग बात है कि संचार क्रांति ने ऐसा विस्तार लिया है कि आज हर किसी के हाथ में मोबाइल जरूर दिख जाता है। एसएमएस फण्डा कमायी का साधन अलग बना हुआ है। टी.वी. पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रमों में एसएमएस करने का आह्वïान किया जाता है। ग्राहक इस तथ्य से अंजान होते हैं कि ऐसा कर वे डका उनकी जेबों पर ही डाल रहे हैं। बाजार का कमाल ही है कि एसएमएस क्रांति के बाद भी कार्ड की दुनिया गुलजार है। जन्मदिन या नववर्ष के लिए कार्ड सीमति नहीं रह गये हैं। अब
हर दिन के लिए कार्ड होने लगे हैं। यहां तक की संवेदना देने के लिए भी कार्ड उपलब्ध कराये गये हैं। अब बाजार में हिन्दी कार्डों की मांग भी तेजी से बढ़ती जा रही है। अंग्रेजी को छोड़ क्षेत्रीय भाषा में भी कार्डों का प्रचलन बढ़ा है। बाजार जानता है कि कार्ड का बिजनेस कभी न रूकने वाला बिजनेस है। बर्थ डे के बाद अब फादर्स डे, मदर्स डे, फै्रण्डशिप डे व वैलेन्टाइन डे के साथ कई डे पर कार्ड उपलब्ध है। 'थैंक्सÓ तथा 'सॉरीÓ कहने के लिए भी कार्ड मौजूद हैं। कार्ड संस्कृति ने कई दिनों को विशेष रूप से समाज में स्थापित किया गया है। वैलेन्टाइन डे की तरह फ्रैण्डशिप डे भी युवाओं के बीच चर्चित करने के लिए कार्ड संस्कृति की अहम भूमिका रही है। पर्व विशेष पर भी कार्ड का प्रचलन अगर बढ़ा है तो यह बाजार की देन ही है। दुर्गापूजा और मकर संक्रांति जैसे पर्वों पर विशेष कार्ड का प्रकाशन भी शुरू हुआ है। कुल मिलाकार बाजार का वार चौतरफा है। ऐसे में हम तो सिर्फ यही कह सकते हैं कि सावधानी से खरीदारी में ही समझदारी है।

रजनीश राज
चिन्तन

सहानुभूति नहीं सहयोग चाहिए विकलांगों को


विकलांगों को सहानुभूति नहीं आपका सहयोग चाहिए। वे दया के पात्र नहीं हैँ। उनको तो बस अपना अधिकारों चाहिए।
समाज में शारीरिक रूप से किसी भी प्रकार का अक्षम होने पर उनको एक प्रकार से मजबूर मान लिया जाता है। मान लिया जाता है कि अब उसके आगे की कोई राह नहीं है। आज जरूरत इस मानसिकता को बदलने की है। उनके प्रति हमारा दृष्टिïकोण बदलना चाहिए। विकलांगों को राहत देने के लिए जरूरी है कि उनके लिए बनने वाली योजनाओं का संचालन सुगम रूप से किया जाय। उनके लिए बनी योजनाओं का लाभ उन्हें बिना किसी कठिनाई के मिल सकें, इसका भी ध्यान रखना होगा। खुद विकलांगों को नहीं मालूम होता है कि उनके लिए किन-किन योजनाओं का संचालन सरकार द्वारा किया जा रहा है। इन योजनाओं के प्रचार-प्रसार की आवश्यकता भी मुख्य रूप से है।
विकलांग होने का अर्थ यह कहीं से नहीं है कि आप समाज में स्वतंत्र रूप से जीवन यापन करने के लिए स्वतंत्र नहीं रह गये हैं। अगर मनोबल ऊंचा है तो कोई भी काम किया जा सकता है। शीला अपवाद है उन लोगों के बीच जो यह समझते हैं कि विकलांग होने का मतलब उदासी और निराशा भरी जिन्दगी है। शीला ने दोनों हाथ न होने के बाद भी खुद को असहाय घोषित नहीं होने दिया। पैरों से ऐसी चित्रकारी उसने की है कि कोई हाथ से क्या कर सकेगा। उसकी कला की तरीफ हर ओर होती है। निश्चित रूप से वह उन लोगों के लिए आदर्श है जो जीवन में आगे बढऩे का ख्वाब देखते हैं। शीला उनके लोगों के लिए भी पे्ररणा है कि जो यह मान लेते हैं कि विकलांगता का अर्थ है कि शून्य। ऐसा शून्य जिसमें कोई रंग भरा नहीं जा सकता है।
इस दुनिया में जीवन और मौत शाश्वत सत्य है। इसके बीच किसी अनहोनी के कारण यह नहीं मान लेना चाहिए कि जीवन समाप्त हो चुका है। जब तक सांस है जब तक आस है। जीवन आशा और विश्वास का दूसरा नाम है। केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय में कार्यरत अजय कुमार शुक्ला इस विश्वास के कारण 21 सालों से एक पैर न होने पर भी बिना किसी सहारे या बैसाखी के आम लोगों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रहे हैं। एक ओर शीला और अजय का उदाहरण है तो दूसरी ओर वे लोग भी हैं कि जो अपनी विकलांगता को अभिशाप मान लेते हैं। इनका पूरा जीवन कोढग़्रस्त हो जाता है। वे अपने सगे-संबंधियों के लिए भार हो जाते हैं। उनके साथ रहना दुर्भर हो जाता है।
कई तो ऐसे भी हैं जो विकलांगता का फायदा ढूंढने में लग जाते हैं। ऐसा कृत्य वे करने लगते हैं जिसको समाज में कभी भी मान्यता नहीं दी जा सकती है। विकलांगता की आड़ में भीख मांगने की राह पर वे निकल पड़ते हैं। उनका यह कदम किसी भी दृष्टिï से उचित नहीं कहा जा सकता है। वास्तव में ऐसी मजबूरी ही न आने दी जाय कि उनके सामने विकलांगता के बाद भीख मांगने की नौबत आ जाय। उनको नौकरी में पर्याप्त अवसर सुलभ कराने की आवश्यकता है। उनके लिए स्वरोजगार को सृजित करने की जरूरत भी है।
प्रदेश में दृष्टिïबाधित, मूक बधिर तथा शारीरिक रूप से विकलांग एवं निराश्रित ऐसे व्यक्ति जिनके जीवन यापन के लिए स्वयं का न तो कोई साधन है और न ही वे किसी प्रकार का ऐसा परिश्रम कर सकते हैं तो उनके भरण-पोषण हेतु 150 रुपये प्रति वर्ष प्रदान किया जाता है। यह तय बात है कि 150 रुपये में कोई विकलांग महीने भर जीवन यापन नहीं कर सकता है। उनके मिलने वाली अनुदान राशि को बढ़ाने की आवश्यकता है। शारीरिक रूप से अक्षम व्यक्तियों को कृत्रिम अंग एवं श्रवण सहायक यंत्र क्रय करने हेतु भी वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है। विकलांग व्यक्तियों सेे विवाह करने पर प्रोत्साहन देने का प्रावधान भी है। विकलांगों के पुनर्वास हेतु दुकान संचालन के लिए भी धनराशि देने की व्यवस्था की गयी है। विकलांग छात्र-छात्राओं को छात्रवृत्ति देने का नियम भी बना है।
सरकार द्वारा उनकी कई दूसरी सुविधाएं देने का प्रयास भी किया गया है। सड़क परिवहन निगम द्वारा उनको नि:शुल्क यात्रा की सुविधा उपलब्ध करायी जाती है। उनका अधिकार यह भी है कि वे व्यावसायिक प्रतिष्ठानों, शासकीय कार्यालयों, प्रमुख बाजारों, मल्टीप्लेक्स तथा सिनेमाहॉल में बिना किसी बाधा के भ्रमण कर सकें। अभी हर जगह यह माहौल सृजित नहीं हो पाया है। इस कारण से विकलांगों को दूसरों पर आश्रित ही रहना पड़ता है।
विभिन्न प्रकार की विकलांगता के निवारण तथा उसके प्रभाव को कम करने के लिए कई केन्द्र भी बनाये गये हैं। इन केन्द्रों और अधिक प्रभावशाली बनाने की जरूरत है। विकलांगों की कला और प्रतिभा को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता भी है। उनके प्रति सहानुभूति की जगह मानवीय संवेदना जरूर रखी जानी चाहिए। उनको उनके होने का अहसास करना काफी जरूरी है। विकलांग जन आत्मनिर्भर हो सकें, इसके लिए जरूरी है कि उनको प्रशिक्षित किया जाय। उन चिकित्सीय संस्थानों को और सम्पन्न करने पर बल दिया जाना चाहिए जो विकलांगता दूर करने में सहायक हो सकती हैं। ऐसे संस्थानों में धन की कोई कमी नहीं आनी चाहिए।
विकलांगों के प्रति समाज के साथ ही घरवालों का रवाइया भी सहज और सरल होना चाहिए। किसी विकलांग को सबसे पहले प्रशिक्षित करने में घरवालों का योगदान रहता है। अगर घर से ही उनको प्रतिकूल माहौल मिलेगा तो उनकी प्रगति प्रभावित होगी। इसी प्रकार उनके प्रति समाज का व्यवहार भी साकारात्मक होना चाहिए।
विकलांगता का इलाज अगर शुरू से किया जाय तो काफी हद तक इससे दूर भी किया जा सकता है। चिकित्सा विज्ञान की उन्नति का लाभ विकलांगों को भी मिलना चाहिए। विकलांगों की बहादुरी पर अलग से एवार्ड घोषित होना चाहिए।


रजनीश राज
चिन्तन

गुलामी में बचपन

देश का बचपन आज भी स्वतंत्र नहीं है। गुलाम बचपन भारत के हर शहर, गांव, गली, चौराहों होटलों, वाहनों, घरों में गुपचुप काम कर रहा है। अपने परिवार की गरीब के कारण उनको गुलामी और शोषण की गाथा विरासत में मिलती है। गरीब परिवार की मजबूरी है अपने नौनिहालों से काम करवाने की। उनमें से कुछ इतने गरीब परिवार से होते हैं कि उन्हें न चाहते हुए भी अपने बच्चों से काम करवाना पड़ता है। एक समय का भोजन उनको तब तक नसीब नहीं होता है जब तक पूरा परिवार काम में न लगा रहे। बाल मजूदरी को रोकने के लिए तमाम कानून बनाये गये हैं। ये कानून तब तक बेनामी है जब तक आम भारतीयों को गरीबी की रेखा से ऊपर नहीं उठाया जायेगा।
दरअसल कोई भी मां बाप अपने बच्चों को स्कूल की बजाय होटलों में दुकानों काम करने के लिए नहीं भेजना चाहता है। उनकी मजबूरी ही होती है कि अपने बच्चों का भविष्य वे दांव पर लगा दे। उनके कल के लिए वे आज से समझौता करने की स्थिति में नहीं होते हैं। बाल मजदूरी पर लगी रोक को ईमानदारी से लागू किया जाये तो क्या सरकार उन बाल मजदूरों को दो वक्त की रोटी दे पायेगी या उनका भविष्य संवर पायेगी, यह प्रश्न अपने में अहं हैं। उनके मां-बाप की ऐसी हैसियत नहीं है कि वो अपने बच्चों को पाल सकेेंगे, उन्हें भर पेट भोजन दे सकें।
मजबूरी में होने वाली बाल मजदूरी को समाज से भी तिरस्कार ही मिल रहा है। लोग बाल मजदूर इसलिए रखते हैं कि वे ईमानदारी से काम करते हैं। इसके बदले उनको मजदूरी भी काफी कम दी जाती है। उनसे डांट-डपट कर काम अलग से करवाया जाता है। सिर्फ इतना होता तो भी ठीक था। मजदूरी की आड़ में उनका शारीरिक शोषण भी होता है। मासूम बचपना यह समझ ही नहीं पाता है की उनके साथ वास्तव में हो क्या रहा है? अगर वे समझ भी जाते हैं तो आवाज उठाने की हिम्मत नहीं कर सकते हैं। आखिरकार उनको दो जून की रोटी तो चाहिए ही चाहिए। बाल मजदूरी करने वाले अधिकांश बच्चे समय से पहले ही बड़े हो जाते हैं। दुनिया को समझने और देखने का उनका अलग ही नजरिया होता है। वे कम उम्र में ही वह सब कुछ सीख जाते हैं जिससे हमेशा ही दूर रहने की हिमायत की जाती है।
बच्चों के भविष्य के विषय में गंभीरता से सोचने की आवश्यकता आज है। बाल मजदूर अपने पेट की आग बुझाने के लिए 200 रुपये से 400 रुपये तक ही महीने में कमाते हैं। इसके लिए वे 12 से 15 घंटे कड़ी मजदूरी करते हैं। वैसे तो उनकी मजदूरी को कोई नियत घंटा नहीं होता है। उनको सुबह से देर रात तक काम करना पड़ता है। पर्वों की खुशी हो या स्वतंत्रता दिवस उन्हें तो बस काम और काम ही करना है।
खेद का विषय तो यह है कि जिन बच्चों के माता पिता होते हैं वे भी मजदूरी करने के लिए बेबस और लाचार हैं। उनकी परिवारिक स्थिति ही ऐसी है कि अगर वे काम करना बंद कर दें तो परिवार में फाका करने की नौबत आ जायेगी। उनको मोटर मैकेनिक, टेलर की दुकानों, होटलों पर काम करने और सीखने के लिए भेजा जाता हैं। मुफ्त में काम सीखाने के बहाने कड़ी मेहनत उनसे करवायी जाती है। एक बार जब बाल मजदूर मालिकों की गिरफ्त में आ जाते हैं तो उनका वहां से निकलना आसान नहीं होता है। यहां तक की घर जाने की अनुमति उनको पर्व और त्यौहारों में भी नहीं होती है। वे कार्यस्थल के अंदर ही अंदर काम करते हैं, वहीं खाना खाते हैं, वहीं पर सोते हैं। कभी-कभी तो सुबह आठ बजे से रात एक बजे तक उनसे काम करवाया जाता है।
बाल मजूदरों का एक दर्द यह भी है कि उनका वेतन भी उनके मां बाप को उतना नहीं भिजवाया जाता है। मगर फिर भी गरीब लाचार नौनिहाल उनका कुछ नहीं कर पाते और अपना श्रमदान करते रहते हैं।
ऐसा नहीं है कि सरकार की ओर से बाल मजदूरी को रोक के लिए कोई नियम नहीं तैयार किया है। सरकार ने घरों में ढाबा, रेस्टारेंट, होटलों में बच्चों से काम लेने पर रोक लगाते हुए अधिसूचना जारी की है। इसका कितना असर हो रहा है यह किसी से छुपा नहीं है। दुर्भाग्य ही है कि बाल श्रमिकों को लेकर हमारे पास पर्याप्त आंकड़े नहीं हैं। मोटे अनुमान के आधार पर देश में लगभग एक करोड़ ऐसे बाल श्रमिक हैं, जो घरेलू नौकर, ढाबे, रेस्टारेंट, होटल, मोटल रिसार्ट में काम करते हैं। उनका दैहिक ओर शारीरिक शोषण किया जाता है।
सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 1996 में बाल श्रमिक प्रथा को समाप्त करने का निर्णय दिया था, लेकिन इस दिशा में सरकारें कुछ ज्यादा नहीं कर सकीं। ऐसा इस कारण है कि बाल मजदूरी का विकल्प दूसरा नहीं है। जब तक गरीबी है बाल मजूदरी रहेगी। बाल श्रमिक ही गरीबी के प्राथमिक कारण हैं। गरीबी के कारण इसका पूरा भविष्य गर्त में है। जिस उम्र में इन्हें अच्छी शिक्षा मिलनी चाहिए वे कामरत होते हैं। शिक्षा और समाजिक दौाव उनकेा ागे बढऩे से रोकता है। बाल मजदूरों के लिए ही तय किया गया था वे काम के बाद कुछ घंटों के लिए पढ़ायी अवश्य करेंगे ताकि उनके आने वाले कल को सुधारा जा सकें। विडम्बना यह है कि जब उनके काम के घंटे ही निर्धारित नहीं है। उनको अपनी मर्जी का जीवन जीने की छूट तक नहीं है। एक दायरे से बाहर निकलने की आजादी नहीं हे तो वे शिक्षा के प्रति कैसे अग्रसर हो पायेंगे।
अकसर यह होता है कि बाल गुलामी में वे कई तरह के मानसिक विकृतियों के शिकार हो जाते हैं। कइयों में तो अपराधिक प्रवृत्ति जन्म ले लेती है। वे जिस कैद में रह रहे होते हैं उससे मुक्ति के लिए कड़े कदम भी उठा लेते हैं। लखनऊ के एक होटल के बाल मजदूरों ने अपने यहां के प्रबंधक की हत्या मात्र इस कारण से कर दी थी कि वह उनको कहीं बाहर नहीं जाने देता था। होटल में रहते-रहते वे उब चुके थे। उनके लिए आजादी ओर पर्व की खुशियों का कोई महत्व नहीं रह गया था। अपनी खुशियों का खून होता देख उन्होंने एक रात के अंधेरे में होटल के प्रबंधक को मार डाला ओर होटल से भाग गये। कई होटल में काम करने वाले बच्चे छोटे-छोटे अपराध पार्टटाइम के रूप में करने लगते हैं। होटल में आये यात्रियों का समान गायब करना उनके लिए बाये हाथ का काम होता है। बचपन गुनाहों से बचा रहे, इसके लिए भी जरूरी है कि बाल मजदूरों के विषय में सोचा जाये। सबसे अहं तो यह है कि उनके बचपन की आजादी उनको लौटायी जाये।

प्रस्तुति-रजनीश राज

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